Favorite Word?

Unse karna ho to प्यार

Unka krna ho to दीदार

Un tak karna ho to मंज़िल

Unke lie krna ho to महफ़िल

Unke saath ho to fir रफ्ता

Unse baat ho to fir रेख्ता

Unko kehna ho to हमदम

Un sang rahna ho to हरदम

Unke bina ho to इज़तीरार

Unke bina ho to इन्तिज़ार

बादशाह

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Ajooba.

बिना कोई मोहोब्बत के दिल धडकाने मे क्या रखा है। नशा जो हो तो हो आंखों का महखाने में क्या रखा है।।

मेरी कविता कागज़ पर वो लिखती है सो जाती है। और सारे तौबा करते उसके सिरहाने में क्या रखा है।।

वो छुपती और छुपाती है पर बातें न किसी को बताती है। कोई बोले उसको जाकर इश्क़ में शर्माने में क्या रखा है।।

है इश्क़ मुझे न जाने वो और उसको भी न माने वो। खुद ही जाने तो अच्छा क्योंकि बहकाने में क्या रखा है।।

उसको बोलो वो जागे राते और बढ़ाये रिश्ते नाते। आंखे वो सुर्ख करे कि जल्दी सो जाने में क्या रखा है।।

-बादशाह

Ijazat.

अपने होठों के क़लम से

तुम्हारे गालों के काग़ज़ पर

अगर इजाज़त हो

तो एक नज़्म लिखना चाहता हूँ

 

उसमें ज़्यादा कुछ नहीं होगा

तुम होगे सिर्फ़

तुम्हारे चेहरे पर, तुम्हारा

नूर दिखाना चाहता हूँ

 

मैं नमाज़ी हूँ

और तुम मेरे खुदा

एक नमाज़ी की तरह, अपने

खुदा को खुदा बताना चाहता हूँ

 

बड़ी बेसब्री में हूँ मैं

तुम इजाज़त दे दो बस

तुम्हारे दिल के हर एक

अरमान जगाना चाहता हूँ

बादशाह ‘मुंतज़िर’

Khwahish.

कुछ चीज़ें ज़ुबान से ऐसे निकलती है

की रुकने का नाम ही नहीं लेती

जैसे तुम्हारा नाम, तुम्हारी तारीफें

तुम्हारे नाम की तारीफें

तुम्हारी कविता, उसका अन्दाज़

तुम्हारे कविता के अन्दाज़ की तारीफ़ें

हमारी कविता, जिसमें तुम हो

और उसमें भी बस तुम्हारी तारीफें

रब को शुक्राना, रब से दुआएं

की तुम पास हो, की और पास आओ

हर लम्हा भले हमारे साथ नहीं

पर हमारे दिल के साथ बिताओ

रुकने का नाम ही नहीं लेती

कुछ चीज़ें ज़ुबान से ऐसे निकलती है

बादशाह ‘मुंतज़िर’

Sawalaat.

*हमेशा की तरह*

मैं कुछ प्रश्न पूछने वाला हूँ।

(हमेशा की तरह)

तुम जवाब मत देना।

(हमेशा की तरह)

ये जो रात की हवा तुम्हारे तरफ़ से आती है वो तुम्हारी ख़ुशबू हमारे तरफ़ क्यूँ ले आती है?

जब तुम अपनी छत पर खड़े हो चाँद को तकती हो तो क्यूँ हमें अपने छत पर तुम्हारी तस्वीर नज़र आती है?

की जब कभी तुम अपने वहाँ पर हमें याद करती हो तो हमारी धड़कनें आख़िर क्यूँ बढ़ जाती है?

और क्यूँ ये धड़कनें काग़ज़ पर जब लिखा जाएँ तो कविता में मुकम्मल हो जाती है?

क्या मैं भी जब कविता लिखता हूँ तो तुम्हारी भी साँसे बढ़ जाती है?

और जब मैं तुमको काग़ज़ पर ना लिखूँ तुम्हें ये बात सताती है?

क्या तुमको हमारे कलम पर हमसे भी ज़्यादा मान होता है?

और क्या कविता पढ़ना लिखने से भी ज़्यादा आसान होता है?

आख़िर क्यूँ ये एहसास ए इश्क़ इश्क़ में नहीं बदल जाता?

आख़िर क्यूँ ये आशिक़ अपने हाल से नहीं संभल पाता?

और क्यूँ तुम हमसे कोई सवाल नहीं पूछ पाते हो?

आख़िर क्यूँ तुम जवाब देने से भी कतराते हो?

ये कुछ सवाल है।

जो मन में आते जाते हैं।

तुम ध्यान मत देना।

(हमेशा की तरह)

इधर हो या उधर हो तुम?

बता भी दो किधर हो तुम?

मंज़िल हो या सफ़र हो तुम?

या मेरे हमसफ़र हो तुम?

छोड़ो रहने दो!

(हमेशा की तरह)

खुदा हाफ़िज़।

बादशाह ‘मुंतज़िर’

Mehjabeen.

उनको देखते ही मैं आंख मूंद लेता हूँ। कोशिश करता हूँ कि उनका चेहरा याद कर लूं।

उनके माथे और नाक के बीच की ढलान। उनके आंखों का वो नूर।

उस नूर को छुपाने वाले ज़ुल्फ़। उन आंखों के नीचे वो काजल।

वो महताब सी उनकी जबीं। हमारे होश उड़ाने वाले उनके वो होठ।

कोशिश करता हूँ कि सब कुछ याद कर लूं। उनको देखते ही मैं आंख मूँदता हूँ।

खूबसूरत से खूबसूरत कोई शब्द ढूंढता हूँ।

बादशाह

Ehtiyat.

दिन ठीक था। शाम अच्छी है। रात करें क्या?

बात करनी है। बात अच्छी है। बात करें क्या?

सबसे अलग। दूर कहीं पर। कायनात करें क्या?

दिल की ख्वाहिश। मन के सपने। एहतियात करें क्या?

कुछ मिसरे। चंद नज़्म ओ ग़ज़ल। बरसात करें क्या?

इश्क़ अच्छा है। एक तरफा नही पर। साथ करें क्या?

बादशाह

Ijazat.

नया कोई इक़रार लिखें क्या? इश्क़ लिखें क्या प्यार लिखें क्या?

शायद पढ़ कर आजाओ तुम। खुद ही को बीमार लिखें क्या?

कोने से कुछ तौबा है तुम्हें। हालत हम मझदार लिखें क्या?

नज़्म लिखें क्या ग़ज़ल लिखें। या फिर कुछ मज़ेदार लिखें क्या?

तुझ पर पूरे निसार हुए हम। फिर भी अब बरकरार लिखें क्या?

हरकत से तो तुम हो तूफान। फिर भी तुमको बहार लिखें क्या?

बादशाह

Bekhabar.

बिना कोई मोहोब्बत के दिल धडकाने मे क्या रखा है। नशा जो हो तो हो आंखों का महखाने में क्या रखा है।।

मेरी कविता कागज़ पर वो लिखती है सो जाती है। और सारे तौबा करते उसके सिरहाने में क्या रखा है।।

वो छुपती और छुपाती है पर बातें न किसीको बताती है। कोई बोले उसको जाकर इश्क़ में शर्माने में क्या रखा है।।

है इश्क़ मुझे न जाने वो और उसको भी न माने वो। खुद ही जाने तो अच्छा क्योंकि बहकाने में क्या रखा है।।

उसको बोलो वो जागे राते और बढ़ाये रिश्ते नाते। आंखे वो सुर्ख करे कि जल्दी सो जाने में क्या रखा है।।

बादशाह

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